शिव-पार्वती के पुनर्मिलन का पर्व हैं हरियाली तीज

विविध संस्कृति को अपनाने वाला यह हमारा भारत वर्ष आज भी अपने अंदर न जाने कितनी ही संस्कृतियों को सजोए हुए हैं । इसीलिए कहते हैं भिन्न-भिन्न संस्कृति के मनाने वाले लोग आज भी इस देश में एकता के बंधन में बंधे हुये हैं | इस देश में हर त्योंहर मनाने का कोई न कोई विशेष पौराणिक महत्व जरूर छिपा रहता हैं | उन्हीं त्योहारों में से एक त्योहार हैं हरियाली तीज, जिसे हम भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के पर्व के रूप में मानते हैं | हरयाली तीज का त्योहार हर वर्ष सावन माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता हैं l अँग्रेजी कलेंडर के अनुसार इस वर्ष यह त्योहार 13 अगस्त को मनाया जाएगा |

हरयाली तीज विशेष रूप से महिलाओं का त्योहार हैं क्यों की जब सावन में जब सम्पूर्ण प्रकृति हरी चादर से आच्छादित होती है, इस अवसर पर महिलाओं के मन में मयूर नृत्य करने लगते हैं। वृक्ष की शाखाओं में झूले पड़ जाते हैं। अलग-अलग जगहों पर इसे अलग-अलग नामों और अलग-अलग तरीकों से मानते हैं | जैसे- पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के रूप में मनाते हैं। सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत काफी मायने रखता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों तरफ हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं। इस उत्सव को हम मेंहदी रस्म भी कह सकते हैं क्योंकि इस दिन महिलाये अपने हाथों, कलाइयों और पैरों आदि पर विभिन्न कलात्मक रीति से मेंहदी रचाती हैं। इसलिए हम इसे मेहंदी पर्व भी कह सकते हैं।इस दिन सुहागिन महिलाएं मेहँदी रचाने के पश्चात् अपने कुल की बुजुर्ग महिलाओं से आशीर्वाद लेना भी एक परम्परा है।

भारतीय पुराणों की मान्यतानुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 107 बार जन्म लिया फिर भी माता को पति के रूप में शिव प्राप्त न हो सके। 108 वीं बार माता पार्वती ने जब जन्म लिया तब श्रावण मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को भगवान शिव पति रूप में प्राप्त हो सके। तभी से इस व्रत का प्रारम्भ हुआ। इस अवसर पर जो सुहागन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके शिव -पार्वती की पूजा करती हैं उनका सुहाग लम्बी अवधि तक बना रहता है। साथ ही देवी पार्वती के कहने पर श‌िव जी ने आशीर्वाद द‌िया क‌ि जो भी कुंवारी कन्या इस व्रत को रखेगी और श‌िव पार्वती की पूजा करेगी उनके व‌िवाह में आने वाली बाधाएं दूर होंगी साथ ही योग्य वर की प्राप्त‌ि होगी। सुहागन स्‍त्र‌ियों को इस व्रत से सौभाग्य की प्राप्त‌ि होगी और लंबे समय तक पत‌ि के साथ वैवाह‌िक जीवन का सुख प्राप्त करेगी। इसल‌िए कुंवारी और सुहागन दोनों ही इस व्रत को रखती हैं।

इस त्योहार को मनाने में हमारी प्रकृति भी हमारा भरपूर साथ देती हैं और उसी समय प्रकृति अपना पूरा रूप एक दम हरा-हरा कर लेती हैं | प्रकृति ही वह शक्ति है जो हमें इस विश्व में सब कुछ प्रदान करती है चाहे वह हमारा खाना हो या हमारा जीवन। हरियाली से मन का तनाव कम होता है और दिमाग को शांति मिलती है। इसलिए अगली बार एक चीज का हमेशा ध्यान रखें अगर आप पर काम का बोझ ज्यादा है और ज्यादातर समय अगर आप मानसिक तनाव से घिरे रहते हैं तो अपने मन को शांत करने के लिए प्रकृति का आनंद उठायें।

इस त्योहार में हरी चूड़ियां, हरा वस्त्र और मेंहदी का विशेष महत्व है। मेंहदी सुहाग का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। इसलिए महिलाएं सुहाग पर्व में मेंहदी जरूर लगाती है। इसकी शीतल तासीर प्रेम और उमंग को संतुलन प्रदान करने का भी काम करती है। ऐसा माना जाता है कि सावन में काम की भावना बढ़ जाती है। मेंहदी इस भावना को नियंत्रित करता है। हरियाली तीज का नियम है कि क्रोध को मन में नहीं आने दें। मेंहदी का औषधीय गुण इसमें महिलाओं की मदद करता है।

हमारी इस प्रकृति ने हमको बहुत कुछ दिया है परंतु हम हमेशा इसे बर्बाद करने में लगे हुए हैं, हमने ने पर्यावरण प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीन हाउस प्रभाव, जैसे कई प्रकृति के विनाश करने वाले कारणों को अपने लाभ के लिए उत्पन्न किया। आज के टेक्नोलॉजी की दुनिया में कई नए आविष्कार किए जाते हैं परंतु इन अविष्कारों से प्रकृति पर क्या असर पड़ेगा यह कोई नहीं सोचता। इसलिए कुछ भी करने से पहले हमें यह सोचना चाहिए कि वह काम करने से प्रकृति को लाभ होगा या हानि। यह जो हमारे त्योहार हैं वो सिर्फ और सिर्फ इसीलिए ही मनाए जाते हैं की हमारी जो हमारी प्रकृति रूपी सम्पदा हैं उसे बचाए रखे और आपस में इसे सुरक्षित रखने के लिए जन मानस को प्रतिज्ञा बद्ध करें |

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