राष्ट्र के विकास की बुनियाद हैं शिक्षक

प्राचीन काल से विश्व गुरु के नाम से प्रसिद्ध हमारा देश भारत आज भी शिक्षा कि नई-नई ऊचाईओं छू रहा है, फिर चाहे वह विद्यालयी शिक्षा हो या महा विद्यालय, विश्वविद्यालय में प्रदान की जाने वाली औपचारिक, अनौपचारिक, आधुनिक शिक्षा ही हो, शिक्षण में शिक्षक की निरंतर बढ़ती भूमिका को आज कौन नकार सकता है? हमारे शिक्षक ही एक सुदृढ़ और विकासशील देश की मजबूत नींव हैं, बच्चों के माता-पिता के अलावा शिक्षक ही बच्चों के ज्ञान और जीवन मूल्यों का मुख्य आधार हैं, किसी भी छात्र और समाज का भविष्य शिक्षकों के हाथ में पूरी तरह सुरक्षित होता है, इसलिये शिक्षकों को राष्ट्र निर्माता भी कहा जाता हैl आज हमारे शिक्षक ही सभ्य समाज के धुरी हैं l इनके बिना सभ्य समाज कि कल्पना करना भी हमारे भारतीय समाज के लिए एक असंभव कार्य के जैसा ही हैं l

किसी राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास के लिए पहले वहाँ के गुरुओं और शिक्षको का विकास और प्रोत्साहन करना जरूरी हैंl क्योंकि अगर हम इनका मान-सम्मान करते रहेंगे ये हमे जीवन में जीने कि सही कलाँ सिखाएँगे l इन्हीं के सम्मान में प्रतिवर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म-दिवस के अवसर पर शिक्षकों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए भारतभर में शिक्षक दिवस 5 सितंबर को मनाया जाता है। ‘गुरु’ का हर किसी के जीवन में बहुत महत्व होता है। समाज में भी उनका अपना एक विशिष्ट स्थान होता है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षा में बहुत विश्वास रखते थे। वे एक महान दार्शनिक और शिक्षक थे। उन्हें अध्यापन से गहरा प्रेम था। एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण उनमें विद्यमान थे। इस दिन समस्त देश में भारत सरकार द्वारा श्रेष्ठ शिक्षकों को पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है।

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन खुद भी एक महान शिक्षक थे, जिन्होंने अपने जीवन के 40 वर्ष अध्यापन पेशे को दिए है। वे विद्यार्थियों के जीवन में शिक्षकों के योगदान और भूमिका के लिये प्रसिद्ध थे। इसलिये वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने शिक्षकों के बारे में सोचा और हर वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रुप में मनाने का अनुरोध किया। डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को हुआ था और 1909 में चेन्नई के प्रेसिडेंसी कॉलेज में अध्यापन पेशे में प्रवेश करने के साथ ही दर्शनशास्त्र से शिक्षक के रुप में अपने करियर की शुरुआत की।
संत कबीर दास जी ने इस धुंधले समाज को अपनी शिक्षा के माध्यम से प्रकाशित किया और इस सभ्य समाज को बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया l उनके इस योगदान का समाज आज भी ऋणी हैं l उन्होने अपने दोहों के द्वारा इस समाज में फैली कुरीतियों और बिराईओ और अंधविश्वास को भी कम किया हैं l उन्होने एक दोहे की रचना के माध्यम से गुरु ज्ञान को उजागर करने का प्रयास किया हैं जिसमे उन्होने कहा है की “गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं। बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय ll” इसमे कबीर के कहने का भाव यह स्पष्ट करता हैं कि “गुरु जी मैं बहुत बड़ी दुविधा में हूँ’,क्योंकि गुरु और गोविन्द दोनो खड़े हैं, अब आप ही बताएं की मैं किसके पैर लगूं। । फिर मैंने गोविन्द को छोड़ा, गुरु के ही पैर छुए ; क्योंकि उसकी ही बलिहारी है, उसी ने गोविन्द को बताया है।

ज्योतिष शास्त्र में भी गुरु के स्थान को सर्वोपरि बताया गया हैं कहा गया हैं कि गुरु अच्छा तो सब अच्छा जिस जातक के लग्न में बृहस्पति स्थित होता है, वह जातक दिव्य देह से युक्त, आभूषणधारी, बुद्धिमान, लंबे शरीर वाला होता है। ऐसा व्यक्ति धनवान, प्रतिष्ठावान तथा राजदरबार में मान-सम्मान पाने वाला होता है। शरीर कांति के समान, गुणवान, गौर वर्ण, सुंदर वाणी से युक्त,सतोगुणी एवं कफ प्रकृति वाला होता है। लग्न का गुरु दीर्घायु, सत्कर्मी, पुत्रवान एवं सुखी बनाता है ।

“गुरु ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात परब्रह्म तस्मैः श्री गुरुवेः नमः ll “

गुरु की महिमा का जितना भी बखान किया जाए उतना कम हैं क्यों की एक गुरु ही ऐसा हैं जो केवल यह सोचता हैं की उसके शिष्य का इस संसार में भला हो और वह उसके जैसा बनकर इस संसार को ज्ञान रूपी दीये से प्रकाश फैला सके l गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा पद दिया गया है। शास्त्र वाक्य में ही गुरु को ही ईश्वर के विभिन्न रूपों- ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर के रूप में स्वीकार किया गया है। गुरु को ब्रह्मा कहा गया क्योंकि वह शिष्य को बनाता है नव जन्म देता है। गुरु, विष्णु भी है क्योंकि वह शिष्य की रक्षा करता है गुरु, साक्षात महेश्वर भी है क्योंकि वह शिष्य के सभी दोषों का संहार भी करता है।

गुरु शिष्य की परंपरा के पवित्र और पावन दिवस की सभी को अनंत शुभकामनाएँ l इस शिक्षक दिवस पर हम आप सभी के उज्ज्वल

भविष्य की ईश्वर से मंगल कामना करते हैं l

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